तहसीलदारों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से दफ्तरों में सन्नाटा, हजारों फाइलें लंबित, लोग परेशान होकर लौटे, प्रशासनिक कामकाज पर बुरा असर पड़ा।
रायपुर।छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के तहसील कार्यालयों में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है। इसकी वजह है – तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की अनिश्चितकालीन हड़ताल, जो सोमवार से शुरू हुई।
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हड़ताल की वजह से हजारों की संख्या में जमीन संबंधी कार्य, नामांतरण, खसरा, बी-1, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र जैसे जरूरी दस्तावेजों की फाइलें लंबित पड़ी हैं। लोग तहसील कार्यालयों से निराश होकर लौट रहे हैं।
हड़ताल क्यों?
तहसीलदार संघ ने राज्य सरकार से वेतन विसंगति दूर करने, पदोन्नति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और कार्यभार के अनुपात में सुविधाएं देने जैसी कई मांगों को लेकर आंदोलन छेड़ा है।
संघ का कहना है कि लंबे समय से मांगों की अनदेखी की जा रही है, जिससे अधिकारियों में असंतोष है। सरकार से कई बार बातचीत हुई, लेकिन समाधान नहीं निकला।
जनता को हो रही परेशानी
हड़ताल का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। ज़मीन खरीदने-बेचने वालों, छात्रवृत्ति के लिए प्रमाण पत्र बनवाने वालों, किसानों को खसरा-बी1 की आवश्यकता वाले लोगों को भारी दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं।
सुनील वर्मा, जो अपने पिता की जमीन का नामांतरण कराने तहसील पहुंचे थे, ने कहा –
प्रशासन की चिंता बढ़ी
हड़ताल से प्रशासनिक मशीनरी पर भी दबाव बढ़ गया है। जिले के कलेक्टरों ने वैकल्पिक व्यवस्थाएं लागू करने की कोशिश की है, लेकिन अनुभवी अधिकारियों की अनुपस्थिति से कार्य रुक गया है।
राजस्व अधिकारियों की यह हड़ताल अगर लंबी चली, तो यह राज्य की जमीन संबंधी योजनाओं, मुआवजे के वितरण, और कई लोक कल्याण योजनाओं को भी प्रभावित करेगी।
क्या बोले संघ पदाधिकारी
राज्य तहसीलदार संघ के अध्यक्ष शशिकांत मिश्रा ने कहा –
हड़ताल का प्रभाव – आंकड़ों में
- लंबित नामांतरण आवेदन: लगभग 20,000
- प्रमाण पत्र पेंडिंग: 15,000 से अधिक
- जांच कार्य: ठप
- सरकारी योजनाओं की निगरानी: प्रभावित
राजनीतिक प्रतिक्रिया
विपक्ष ने इस हड़ताल को सरकार की “प्रशासनिक विफलता” बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता अजय सिंह ने कहा कि यह सरकार की उदासीनता का नतीजा है कि अधिकारी वर्ग आंदोलन को मजबूर हो गया।
वहीं, राज्य सरकार ने बातचीत की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की बात कही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार मांगों पर विचार कर रही है।
क्या हो सकते हैं परिणाम?
अगर हड़ताल लंबी चलती है, तो ज़मीन विवादों के निपटारे, कोर्ट के मामलों में रिपोर्ट देने और राजस्व वसूली जैसे अहम काम और ज्यादा प्रभावित होंगे।
इसके अलावा सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, जैसे PM-KISAN, पीएम आवास योजना आदि के दस्तावेज़ सत्यापन कार्य भी रुक गए हैं।
स्थानीय लोगों की अपील
ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों ने सरकार से अपील की है कि जल्द से जल्द समाधान निकाला जाए। कई लोगों का कहना है कि उन्हें हर बार 50-100 किलोमीटर दूर से आना पड़ता है और फिर खाली हाथ लौटना होता है।
निष्कर्ष नहीं, लेकिन सवाल जरूरी
सरकारी मशीनरी का एक अहम हिस्सा जब काम छोड़ दे, तो सिर्फ फाइलें नहीं रुकतीं – लोगों का विश्वास भी डगमगाता है। अब गेंद सरकार के पाले में है। क्या समाधान निकलेगा, या प्रशासनिक ठहराव और गहरा होगा?


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