खैरागढ़ शहर जलभराव से जूझ रहा है, लेकिन इसकी असली वजह बारिश नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही और योजनागत विफलता है।
खैरागढ़। छत्तीसगढ़ का खैरागढ़ शहर इन दिनों बारिश से कम, लेकिन लापरवाही से ज्यादा डूब रहा है। जहां एक ओर लोग भारी जलभराव से परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वास्तव में बारिश इतनी हुई है कि शहर जलमग्न हो जाए, या फिर ये हालात प्रशासन की विफल योजनाओं और लापरवाही का नतीजा हैं?
स्थानीय निवासियों और व्यापारी संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों से जो हालात बने हैं, वो पूरी तरह से नगर परिषद और अन्य जिम्मेदार विभागों की संदिग्ध कार्यशैली का परिणाम हैं।
सड़कों पर बह रहा है जीवन
शहर की हालत ऐसी है कि मुख्य बाजार, स्कूल, अस्पताल, और रिहायशी कॉलोनियों तक पानी से भरे हुए हैं। सड़कें नालों में तब्दील हो चुकी हैं, और लोग मजबूरी में छातों, बूटों और प्लास्टिक बैग में सामान लपेटकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं।
स्थानीय निवासी राकेश साहू का कहना है –
नाले की सफाई नहीं, विकास कार्य अधूरे
नगरपालिका की ओर से हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और जल निकासी की व्यवस्था की जानी चाहिए थी, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। नतीजतन, बारिश का पानी सड़कों पर जमा होकर घर और दुकानों में घुस गया।
विकास कार्यों की बात करें तो, कई जगह सड़कें खुदी पड़ी हैं, सीवरेज प्रोजेक्ट अधूरे हैं, और कुछ जगह तो पाइपलाइन बिछाने के बाद सड़कें ऐसे ही छोड़ दी गई हैं। पानी के बहाव की कोई दिशा नहीं है, और प्रशासन आंख मूंदकर बैठा है।
व्यापारी वर्ग का भारी नुकसान
खैरागढ़ का प्रमुख बाजार गोलबाजार और बंजारी चौक, जहां रोज़ लाखों का व्यापार होता है, वहां अब ग्राहक पहुंच ही नहीं पा रहे। दुकानदारों के अनुसार, बीते सप्ताह में उनका 60-70% कारोबार ठप हो गया है।
दुकानदार अशोक वाजपेयी ने बताया –
स्कूल-कॉलेज और अस्पताल भी प्रभावित
खैरागढ़ में गवर्नमेंट कॉलेज, स्कूल और सिविल अस्पताल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर भी जलभराव से अफरातफरी का माहौल है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, मरीजों को अस्पताल पहुंचने में मुश्किल हो रही है, और कई एम्बुलेंस रास्ते में फंसी मिलीं।
स्थानीय डॉक्टरों ने बताया कि साफ-सफाई के अभाव में अब बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है, खासकर डेंगू, मलेरिया और स्किन इन्फेक्शन जैसे संक्रमणों का।
प्रशासन का मौन रवैया
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि स्थानीय प्रशासन की तरफ से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। नगर परिषद, पीडब्ल्यूडी और जल संसाधन विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने में लगे हैं।
जब मीडिया ने नगर पालिका अध्यक्ष से सवाल किया, तो उन्होंने जवाब दिया –
लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बयान हर साल की घिसी-पिटी स्क्रिप्ट जैसा है। ना तो सफाई हुई, ना कोई वैकल्पिक जल निकासी व्यवस्था बनाई गई।
जनता का फूटा गुस्सा
इन हालातों से परेशान होकर स्थानीय नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। उन्होंने नगरपालिका कार्यालय के सामने जमा होकर प्रशासन की नाकामी पर सवाल उठाए, और कहा कि अगर हालात नहीं सुधरे तो बड़े आंदोलन की तैयारी करेंगे।
छात्र संगठन, व्यापारी संघ और नागरिक मंच ने मिलकर प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें जल्द से जल्द नालों की सफाई, जलनिकासी योजना और मुआवजा की मांग की गई।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की स्थिति से बचने के लिए हर साल पूर्व मानसून कार्य योजना, ड्रेनेज सुधार, और स्थायी जल निकासी संरचना बनानी होगी।
साथ ही नगरपालिका को चाहिए कि वह एक आपातकालीन जल प्रबंधन टीम गठित करे, जो मानसून के दौरान तुरंत प्रतिक्रिया दे सके।
निष्कर्ष
खैरागढ़ का जलभराव केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित संकट है। जिस समस्या को समय रहते रोका जा सकता था, उसे प्रशासन की अनदेखी और गैर-जिम्मेदार रवैये ने विकराल बना दिया।
अगर अब भी संबंधित विभाग नहीं जागे, तो ये केवल एक शहर की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की हार मानी जाएगी।
खैरागढ़ की जनता आज जवाब मांग रही है – जवाब नाले से नहीं, नीयत से चाहिए।
