नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनी जाने वाली प्रक्रिया में अचानक और असामयिक घेराबंदी की आहट स्पष्ट है — जब लोकतांत्रिक परिदृश्य में किसी ऐसी बीज बोया जा रहा है जो भरोसे पर चोट करता है। 7 अगस्त 2025 को चुनाव आयोग ने उपराष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी की, जिससे औपचारिक रूप से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई। लेकिन इस प्रक्रिया के साथ उठ रहे सवालों ने लोकतांत्रिक जवाबदेही पर छाया डाला है।
1. अचानक इस्तीफा, अस्वाभाविक चुनाव प्रक्रिया
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को अचानक स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। ऐसा अचानक इस्तीफा, जब उनकी तय अवधि अगस्त 2027 तक थी, इस संदर्भ में अनायास भारी प्रतीत हुआ। इसके बाद, संविधान के प्रावधानों के अनुरूप एक मध्यावधि चुनाव की आवश्यकता हुई, लेकिन इसकी अचानक घोषणा ने लोकतंत्र की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए।
2. घुमा‑फिरा कर योजना, जनता में आशंका
चुनाव आयोग ने 7 अगस्त को नामांकन की प्रक्रिया आरंभ की — नाम भरने की अंतिम तिथि 21 अगस्त, नाम जांच की तिथि 22 अगस्त, और वापस लेने की आखिरी तारीख 25 अगस्त रखी गई। फिर मतदान 9 सितंबर को रखा गया है। इन घनिष्ठ समयसीमाओं ने आम जनता और संभावित प्रत्याशियों को भारी अवरोधों में डाल दिया है — जो लोकतांत्रिक ढांचे से मेल नहीं खाता।
3. चुनावी गठबंधन का सहज समर्थन, विपक्षी आचरण पर सवाल
राष्ट्रवादियों (NDA) को स्पष्ट आंकिक बढ़त हासिल है — लोकसभा में 293 और राज्यसभा में 129 सदस्यों का समर्थन प्रस्तावित प्रत्याशी को सहज रूप से उम्मीद से अधिक वोट दिला सकता है। लेकिन जब चुनाव “पूर्वनिर्धारित” हो, तो प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ जाना स्वाभाविक है। यह जनता की आंखों में निष्पक्ष प्रतियोगिता की तरह नहीं, बल्कि समीकरण आधारित निर्णय जैसा दिखता है।
4. निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान
उपराष्ट्रपति चुनाव का मतदान दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा गुप्त पैमाने और एकल हस्तांतरणीय वोट पद्धति से होता है। हालांकि यह एक संवैधानिक व्यवस्था है, लेकिन जब नामांकन प्रक्रिया त्वरित और सुनियोजित हो, तो यह लोकतंत्र के आत्म‑निरीक्षण की मिसाल नहीं रह जाती। यह प्रक्रिया ऐसी मानी जा सकती है जो मत‑अधिकारियों को प्रभावी रूप से “देखा गया” महसूस कराए — जो लोकतंत्र की आधारशिला की अवहेलना है।
5. मध्यावधि चुनाव के पीछे निहित राजनैतिक चाल?
जब किसी पद पर रुझान तब तक नहीं दिख रहे होते, औचक इस्तीफा और तुरंत चुनाव की प्रक्रिया निश्चित रूप से योजनाबद्ध लगती है। इससे लोकतंत्र में खुली प्रतिस्पर्धा का माहौल अवरुद्ध होता है। ऐसी प्रक्रिया से समय‑समय पर यह धारणा बनती है कि “फैसला ऊपर से तय हो चुका है”, जबकि लोकतंत्र की उम्मीद आमजन और विपक्ष में रहती है।
6. लोकतांत्रिक विश्वास पर उतरती धूल
इस तरह की प्रक्रिया से लोकतंत्र में विश्वास की नींव कमजोर पड़ती है — जब समयबद्ध नहीं, बल्कि जल्दबाज़ी में निर्णय लिए जाएं। उपराष्ट्रपति पद संवैधानिक रूप से उच्चतम सम्मान का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन प्रक्रिया की धूमधाम और त्वरितता से यह पद मामूली राजनीतिक समीकरण में सीमित हो गया प्रतीत होता है।
निचोड़ (संक्षेप में)
- राष्ट्रपति पद की इच्छा रखने वाले लोकतंत्र में विपक्षी और जनता को पर्याप्त समय, पारदर्शिता और सहयोग देना चाहिए था, पर यह प्रक्रिया इसे झुठला रही है।
- अचानक इस्तीफे के बाद की यह प्रक्रिया किसी सुनियोजित रणनीति या राजनीतिक मजबूरी की ओर भी संकेत कर सकती है।
- लोकतंत्र का महत्व स्वच्छ प्रक्रिया, विश्वास और निष्पक्षता में है – इनका उल्लंघन होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
