विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व 5 सितंबर से शुरू, आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम। फूल रथ परिक्रमा और कलश स्थापना बनेगी खास आकर्षण।
जगदलपुर। बस्तर की संस्कृति, परंपरा और आस्था का प्रतीक विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व इस वर्ष 5 सितंबर से आरंभ होने जा रहा है। यह पर्व न केवल बस्तर संभाग के लिए बल्कि पूरे देश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व आदिवासी संस्कृति, सामुदायिक आस्था और परंपरागत विधियों का अद्भुत संगम है।
डेरी गड़ाई विधान से होगी शुरुआत
5 सितंबर को डेरी गड़ाई विधान के साथ पर्व की शुरुआत होगी। इसके तहत सिरहा सार भवन में विशेष रस्म आयोजित की जाएगी। इस मौके पर 10 फीट लंबी सरई की लकड़ी का पूजन कर उस पर हल्दी और नया कपड़ा बांधा जाएगा। यह लकड़ी पारंपरिक रूप से बिरिंगपाल गांव से लाई जाती है, जो दशहरा उत्सव का प्रमुख हिस्सा है।
आने वाले दिनों की रस्में
बस्तर दशहरा केवल विजयादशमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लंबे समय तक चलने वाला पर्व है।
- 21 सितंबर को काछन गादी रस्म का आयोजन होगा।
- 23 सितंबर को कलश स्थापना और जोगी बिठाई की रस्म पूरी की जाएगी।
- 24 से 29 सितंबर तक फूल रथ परिक्रमा का आयोजन होगा, जिसमें श्रद्धालु हजारों की संख्या में शामिल होकर परंपरा को जीवंत बनाते हैं।
सांस्कृतिक महत्व और परंपरा
बस्तर दशहरा का सबसे खास पहलू यह है कि यहां रावण दहन नहीं किया जाता। इसके बजाय यह पर्व देवी माईजी के प्रति आस्था और श्रद्धा के रूप में मनाया जाता है। जनजातीय परंपराओं से जुड़े विशेष अनुष्ठान और रस्में इस पर्व को विशिष्ट बनाती हैं।
यह दशहरा बस्तर की आदिवासी संस्कृति की गहराई, उनकी मान्यताओं और सामाजिक एकता का परिचायक है। हर साल यहां हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं, जिससे यह पर्व सांस्कृतिक पर्यटन का भी केंद्र बन गया है।
श्रद्धालुओं का आस्था केंद्र
बस्तर दशहरा केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर से श्रद्धालु इस पर्व को देखने के लिए जगदलपुर आते हैं। यह उत्सव परंपरा और आधुनिकता का ऐसा अनोखा संगम है जो हर व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है।
प्रशासन की तैयारी
जगदलपुर जिला प्रशासन और दशहरा समिति ने पर्व को लेकर व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर विशेष योजनाएं बनाई जा रही हैं।





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