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लोक संस्कृति का कार्यक्रम, मंच पर छाया वेस्टर्न अंदाज़

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 30 December 2025

लोक संस्कृति के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में वेस्टर्न प्रस्तुतियों की भरमार, छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को मंच न मिलने पर उठे सवाल और नाराज़गी।

रायपुर। लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में उस समय विवाद खड़ा हो गया, जब मंच पर पारंपरिक छत्तीसगढ़ी कला की जगह वेस्टर्न संस्कृति की झलक देखने को मिली। कार्यक्रम की थीम लोक संस्कृति थी, लेकिन प्रस्तुतियों में पाश्चात्य संगीत, डांस और आधुनिक अंदाज़ हावी रहा। इस विरोधाभास ने कलाकारों, संस्कृति प्रेमियों और आम दर्शकों को हैरानी में डाल दिया।

लोक संस्कृति के नाम पर वेस्टर्न तड़का

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य, लोकगीत, पंथी, सुआ और राउत नाचा जैसी विधाओं को अपेक्षित मंच नहीं मिला। इसके विपरीत, वेस्टर्न डांस, फिल्मी गीतों और आधुनिक लाइटिंग ने पूरे आयोजन को अपने रंग में रंग दिया। आयोजकों द्वारा लोक संस्कृति संरक्षण का दावा किए जाने के बावजूद मंचीय कार्यक्रमों में स्थानीय कला लगभग हाशिए पर दिखी।

कलाकारों में नाराज़गी

स्थानीय लोक कलाकारों ने इस पर नाराज़गी जाहिर की। उनका कहना है कि ऐसे आयोजनों से ही नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकता है, लेकिन जब लोक संस्कृति के नाम पर वेस्टर्न प्रस्तुति होगी तो मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। कई कलाकारों ने सवाल उठाया कि जब बजट और मंच उपलब्ध था, तो पारंपरिक कलाकारों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई।

संस्कृति प्रेमियों ने उठाए सवाल

कार्यक्रम देखने पहुंचे संस्कृति प्रेमियों और बुद्धिजीवियों ने भी आयोजन की दिशा पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि लोक संस्कृति केवल सजावट या पोस्टर तक सीमित रह गई है। मंच पर वही संस्कृति दिखनी चाहिए, जिसकी बात कार्यक्रम के नाम और उद्देश्य में की जाती है।

आयोजकों का पक्ष

आयोजकों की ओर से सफाई दी गई कि युवाओं को आकर्षित करने के लिए कुछ आधुनिक प्रस्तुतियों को शामिल किया गया था। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि आधुनिकता और लोक परंपरा में संतुलन होना चाहिए, न कि लोक संस्कृति को पीछे धकेलकर वेस्टर्न को आगे बढ़ाना।

संरक्षण की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति पहले ही आधुनिकता की मार झेल रही है। ऐसे में सरकारी और सार्वजनिक मंचों पर लोक कलाकारों को प्राथमिकता देना समय की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रह सकें।

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