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आदिवासी समाज ने फर्जी शिक्षक खिलाफ मोर्चा खोला

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 14 August 2025

आदिवासी समाज ने फर्जी जाति प्रमाणपत्र से नौकरी करने वाले शिक्षकों के खिलाफ मोर्चा खोला, कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और तत्काल कार्रवाई की मांग की।

कवर्धा।छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज ने शिक्षा क्षेत्र में फैले फर्जी जाति प्रमाणपत्र के मामले को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। समाज के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की।

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आदिवासी समाज की शिकायत

समाज का आरोप है कि कुछ शिक्षक अपने पद और नौकरी हासिल करने के लिए फर्जी आदिवासी जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे असली आदिवासी उम्मीदवारों के हक पर असर पड़ रहा है और न्यायिक व्यवस्था की भी अनदेखी हो रही है।

आदिवासी समाज के एक नेता ने कहा, “हमारी पीढ़ी के बच्चों को शिक्षा में अवसर मिलने चाहिए। फर्जी प्रमाणपत्र से पद पाने वाले शिक्षक समाज के असली बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।”


ज्ञापन में मांगें

ज्ञापन में आदिवासी समाज ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  1. फर्जी जाति प्रमाणपत्र का गंभीरता से जांच।
  2. दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और नौकरी से बर्खास्तगी।
  3. भविष्य में ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए सिस्टम सुधार।

प्रशासन की प्रतिक्रिया

कलेक्टर ने ज्ञापन प्राप्त कर समाज के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने आश्वस्त किया कि मामला उच्च अधिकारियों को भेजा जाएगा और जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “फर्जी प्रमाणपत्र के मामले गंभीर हैं। हम जांच प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कदम उठाए जाएंगे।”


शिक्षा क्षेत्र पर असर

फर्जी प्रमाणपत्र के कारण असली आदिवासी शिक्षक नौकरी से वंचित हो रहे हैं। इससे शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। समाज का कहना है कि इसे जल्द सुलझाया जाना चाहिए।


समाज की चेतावनी

आदिवासी समाज ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने तुरंत कदम नहीं उठाए, तो वे बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। उनका मानना है कि यह सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा का मुद्दा है।


निष्कर्ष

फर्जी जाति प्रमाणपत्र का उपयोग समाज में असमानता बढ़ा रहा है और असली हकदारों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। आदिवासी समाज की यह पहल प्रशासन और समाज के लिए चेतावनी है कि ऐसे मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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