दंतेवाड़ा में टूटी पुलिया और उफनती नदी पार कर स्कूल जाते बच्चों की सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को ठोस कदम उठाने के दिए निर्देश।
बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और आसपास के नक्सल प्रभावित इलाकों में बच्चे हर रोज जान जोखिम में डालकर पढ़ाई के लिए निकलते हैं। टूटी हुई पुलिया और उफनती नदी पार कर स्कूल पहुंचना उनकी मजबूरी बन चुकी है। हालात इतने भयावह हैं कि कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है। इस गंभीर विषय पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की और राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं।
बच्चों की जिंदगी से जुड़ा संवेदनशील मामला
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि यह बच्चों की जिंदगी और शिक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए और इस तरह की परिस्थितियों को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर क्यों आजादी के इतने सालों बाद भी बच्चों को स्कूल जाने के लिए नदी और टूटी पुलिया पार करनी पड़ रही है। कोर्ट ने सरकार को तत्काल प्रभाव से वैकल्पिक इंतजाम करने और स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया है।
बरसात में और बिगड़ते हालात
दंतेवाड़ा समेत बस्तर के कई इलाकों में बारिश के दिनों में स्थिति और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। पुलिया और रास्ते टूट जाते हैं, नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे बच्चों का स्कूल जाना और भी मुश्किल हो जाता है। कई बार बच्चे घर लौट नहीं पाते और ग्रामीणों की मदद से किसी तरह सुरक्षित निकलते हैं।
ग्रामीणों की आवाज अब कोर्ट तक
स्थानीय ग्रामीण कई बार प्रशासन से शिकायत कर चुके हैं, लेकिन सुधार की गति बेहद धीमी रही। हालात इतने बिगड़े कि अब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। कोर्ट की सख्ती से अब उम्मीद जगी है कि सरकार बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए ठोस कदम उठाएगी।
शिक्षा और सुरक्षा दोनों पर सवाल
हाईकोर्ट की इस सुनवाई ने न केवल बच्चों की सुरक्षा बल्कि शिक्षा के अधिकार पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया है। अगर बच्चे सुरक्षित ढंग से स्कूल ही नहीं पहुंच पाएंगे, तो पढ़ाई का अधिकार अधूरा ही रह जाएगा।
सरकार पर बढ़ा दबाव
कोर्ट की टिप्पणी के बाद राज्य सरकार पर दबाव बढ़ गया है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस पर कितनी जल्दी ठोस कदम उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो यह मामला सरकार की जवाबदेही पर सीधा असर डाल सकता है।
