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RDA प्लाट घोटाला: तीन अभियंता बरी, रमेश झाबक दोषी

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 2 September 2025

RDA प्लाट घोटाले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन अभियंता बरी, कारोबारी रमेश झाबक की सजा बरकरार, भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था पर नई बहस।


बिलासपुर. विकास प्राधिकरण (RDA) प्लाट घोटाला मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने जहाँ तीन अभियंताओं को आरोपमुक्त करते हुए बरी कर दिया, वहीं कारोबारी रमेश झाबक की सजा को बरकरार रखा है। यह फैसला न केवल इस घोटाले से जुड़े कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करता है बल्कि भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी नई बहस छेड़ता है।

घोटाले का पृष्ठभूमि

RDA प्लाट घोटाले का मामला लंबे समय से अदालत में विचाराधीन था। आरोप था कि RDA की योजनाओं में हेरफेर कर अवैध रूप से प्लाटों का आवंटन किया गया। इसमें कई अभियंता और कारोबारी शामिल बताए गए थे। जांच के दौरान अभियंताओं और कारोबारी रमेश झाबक के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए थे, जिसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा सुनाई थी।


अभियंताओं को मिली राहत

हाईकोर्ट ने गहन सुनवाई के बाद पाया कि अभियंताओं के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं। अदालत ने माना कि अभियंताओं की भूमिका केवल तकनीकी स्तर तक सीमित थी और उन्हें सीधे तौर पर घोटाले में शामिल साबित नहीं किया जा सकता। इस आधार पर अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।


रमेश झाबक की सजा कायम

हालांकि कारोबारी रमेश झाबक को हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली। अदालत ने माना कि झाबक की संलिप्तता के पर्याप्त प्रमाण हैं और उन्होंने लाभ उठाने के लिए पूरे षड्यंत्र को अंजाम दिया। निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को हाईकोर्ट ने यथावत रखा।


कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला न्यायपालिका की गहन पड़ताल और निष्पक्षता का उदाहरण है। अभियंताओं की भूमिका पर संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने उन्हें राहत दी, वहीं घोटाले में वास्तविक रूप से लाभ उठाने वाले कारोबारी पर कानून का शिकंजा और कस दिया।


समाज और राजनीति पर असर

यह मामला न केवल RDA के कामकाज पर सवाल उठाता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकारी योजनाओं में किस तरह भ्रष्टाचार घर कर सकता है। अदालत के फैसले से साफ है कि कानून के दायरे में रहकर ही काम करना आवश्यक है। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं में शामिल लोगों को अंततः न्यायपालिका के कठघरे में जवाब देना ही होगा।


आगे की प्रक्रिया

रमेश झाबक के पास अब सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प बचता है। वहीं RDA और राज्य सरकार इस फैसले के बाद आंतरिक स्तर पर सिस्टम को और पारदर्शी बनाने पर विचार कर सकती है ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।


निष्कर्ष

RDA प्लाट घोटाला मामला एक बार फिर यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार चाहे कितना भी संगठित क्यों न हो, न्यायिक प्रक्रिया के सामने टिक नहीं सकता। अभियंताओं को राहत और कारोबारी रमेश झाबक की सजा बरकरार रहना यह दर्शाता है कि अदालत निष्पक्ष रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका का गहन मूल्यांकन करती है।


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