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पैरा-आर्मरेसलर श्रीमंत झा बोले, हमें पहचान चाहिए

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 2 August 2025

छत्तीसगढ़ के पैरा-आर्मरेसलर श्रीमंत झा ने कहा, सिर्फ मेडल नहीं, समाज में पहचान चाहिए। सरकार से न्याय और समर्थन की मांग की।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के अंतरराष्ट्रीय पैरा-आर्मरेसलर श्रीमंत झा ने एक भावुक अपील करते हुए कहा कि खिलाड़ियों को सिर्फ पदक नहीं, बल्कि समाज में पहचान और सम्मान भी चाहिए। उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि वे वर्षों से देश और राज्य के लिए खेल रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें वह पहचान और सहयोग नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं।

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विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया

श्रीमंत झा छत्तीसगढ़ के ऐसे पैरा-आर्मरेसलर हैं, जिन्होंने कई बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया और मेडल जीते। उनके नाम अब तक:

  • 50 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक
  • 5 विश्व चैंपियनशिप में प्रतिनिधित्व
  • 30 देशों में प्रतियोगिता अनुभव

उनकी सफलता के पीछे कई वर्षों की कड़ी मेहनत, आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता है। श्रीमंत ने बताया कि एक हादसे में उनका बायां हाथ पूरी तरह निष्क्रिय हो गया था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।


“हमें भी इंसान समझा जाए”

अपने हालिया बयान में श्रीमंत ने कहा:

“हम पैरा-एथलीट हैं तो क्या? हमें भी इंसान समझा जाए। हम सिर्फ मेडल जीतने की मशीन नहीं हैं। हमारी भी भावनाएं हैं, परिवार है, जरूरतें हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि वे अक्सर फंडिंग, स्पॉन्सरशिप, ट्रेनिंग सुविधा और प्रोत्साहन की कमी से जूझते हैं, जबकि सामान्य खिलाड़ियों को बेहतर संसाधन मिलते हैं।


सरकारी उपेक्षा से आहत हैं झा

श्रीमंत ने राज्य सरकार और खेल विभाग से नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि बार-बार आवेदन और निवेदन के बावजूद उन्हें:

  • सरकारी नौकरी नहीं मिली
  • प्रोत्साहन राशि नहीं दी गई
  • कोई मान्यता या पुरस्कार नहीं मिला

उनका कहना है कि वे चाहते हैं कि सरकार पैरा-खिलाड़ियों के लिए विशेष नीति बनाए, जिससे भविष्य में कोई भी प्रतिभा उपेक्षित न रहे।


समाज में पहचान की जंग

श्रीमंत झा ने यह भी कहा कि सबसे बड़ी लड़ाई केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान की है। उन्होंने कहा:

“जब हम मेडल लेकर लौटते हैं, तो अखबारों में एक दिन की हेडलाइन बनते हैं। लेकिन उसके बाद सब भूल जाते हैं। हमें स्थायी पहचान चाहिए, न कि सिर्फ तालियां।”

उन्होंने यह भी मांग की कि मीडिया, समाज और राजनीतिक संस्थाएं पैरा-खिलाड़ियों को भी उसी सम्मान और प्रचार से देखें जैसा सामान्य खिलाड़ियों को मिलता है।


मजबूती से खड़े हैं, लेकिन समर्थन की जरूरत

हालांकि सारी चुनौतियों के बावजूद श्रीमंत झा आज भी ट्रेनिंग कर रहे हैं और अगली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की तैयारी में जुटे हैं। वे देश के लिए पैरा-ओलंपिक्स में खेलने का सपना देखते हैं। लेकिन उनके अनुसार, बिना सरकार और समाज के सहयोग से यह रास्ता मुश्किल है।


खेल मंत्री और मुख्यमंत्री से की अपील

श्रीमंत झा ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और खेल मंत्री से सीधे अपील की कि वे:

  • पैरा-खिलाड़ियों के लिए विशेष सहायता नीति लागू करें
  • उन्हें रोजगार और सम्मान दें
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को राज्य का ब्रांड एम्बेसडर बनाएं

खेलों में समावेशन की ज़रूरत

श्रीमंत के बयान ने एक बार फिर भारत में पैरा-स्पोर्ट्स को लेकर सामाजिक और नीतिगत सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पैरा-खिलाड़ियों को समान अवसर, सम्मान और पहचान नहीं मिलेगी, तब तक भारत “समावेशी खेल राष्ट्र” नहीं बन पाएगा।


निष्कर्ष

श्रीमंत झा जैसे खिलाड़ी सिर्फ पदक जीतने नहीं, बल्कि हौसले और आत्मविश्वास की मिसाल बनते हैं। उनकी बातों से साफ है कि अब समय आ गया है जब पैरा-खिलाड़ियों को भी नायक की तरह देखा जाए, न कि केवल सहानुभूति की दृष्टि से। राज्य सरकार और समाज को उनके सम्मान और अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, ताकि वे गर्व से कह सकें – “हमें भी पहचान मिली।”

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