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नक्सल आतंक में राखी पर भी साया

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 5 August 2025

बीजापुर, छत्तीसगढ़: इस साल रक्षाबंधन 9 अगस्त को मनाया जाएगा और पूरे देश में बाजारों में रंग-बिरंगी राखियों की दुकानें सज रही हैं। डाक विभाग भी भाइयों तक राखियां पहुंचाने के लिए जगह-जगह पीली पेटियां लगा चुका है। लेकिन बीजापुर के भैरमगढ़ ब्लॉक में एक ऐसा शिविर है, जहां राखी का रंग और खुशियां नक्सल हिंसा के काले साए के बीच बुनी जा रही हैं।

यहां 50 किलोमीटर दूर स्थित भैरमगढ़ शिविर में रहने वाली कुछ महिलाएं बांस और ताड़ के पत्तों से देशी राखियां बना रही हैं। इन राखियों की न केवल सुंदरता प्राकृतिक है, बल्कि इनके पीछे एक दर्दनाक कहानी भी छिपी है।


💔 नक्सल हिंसा से उजड़ा घर

राखी बनाने वाले इस समूह में शामिल मंगलदई मूल रूप से माओवादी प्रभावित ईतामपारा ग्राम पंचायत की रहने वाली हैं। कुछ साल पहले उनके जेठ स्व. चैतू राम यादव को माओवादियों ने पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाकर निर्दयता से हत्या कर दी। यह हत्या उनके सामने हुई, जिसने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया।

हत्या के बाद भय का माहौल इतना था कि उनके परिवार को लगा, अगर गांव में रहे तो बाकी सदस्यों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। नतीजतन, पूरा परिवार ईतामपारा छोड़कर भैरमगढ़ के राहत शिविर में आकर बस गया।


🪢 राखी में संघर्ष की कहानी

मंगलदई और उनके साथ की अन्य महिलाएं अब इसी शिविर में रहकर रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए बांस और ताड़ के पत्तों से राखी बनाती हैं।

  • राखियों को पूरी तरह हाथ से तैयार किया जाता है।
  • इनमें प्लास्टिक या केमिकल रंग का इस्तेमाल नहीं होता।
  • एक राखी की कीमत बाज़ार में 20 से 50 रुपये तक मिल जाती है।

हर साल रक्षाबंधन के समय ये महिलाएं लगभग ₹60,000 तक की बिक्री कर लेती हैं, जो उनके सालभर के गुजारे में बड़ी मदद करता है।


⚠️ नक्सल छाया में उत्सव

हालांकि यह काम उन्हें आत्मनिर्भर बना रहा है, लेकिन नक्सल आतंक का डर अब भी साथ है। कई बार राखी के ऑर्डर देने वाले गांवों में जाने से पहले महिलाएं सोचती हैं कि कहीं रास्ते में माओवादी न मिल जाएं।

शिविर में रहकर भी ये महिलाएं रोजमर्रा की ज़िंदगी में अपनी पहचान और सम्मान बचाने की कोशिश कर रही हैं। उनके लिए राखी सिर्फ भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष और जीने की इच्छा का प्रमाण है।


📝 निष्कर्ष

भैरमगढ़ शिविर की ये राखियां भले ही साधारण बांस और ताड़ के पत्तों से बनी हों, लेकिन इनमें खोए हुए घर, मारे गए प्रियजन और असुरक्षित भविष्य की कहानी गहराई से बसी है।
जब पूरा देश रक्षाबंधन पर खुशियों में डूबा होगा, तब बीजापुर की ये महिलाएं इस त्यौहार में अपनी मेहनत और संघर्ष की महक जोड़ेंगी—लेकिन नक्सल आतंक का साया उनकी जिंदगी से कब हटेगा, यह अब भी अनिश्चित है।

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