KGMU लखनऊ से डॉक्टरों का पलायन बढ़ रहा है। वेतन, संसाधनों और काम के बोझ से परेशान डॉक्टर निजी और विदेशी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं।

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KGMU जैसे संस्थान सिर्फ अस्पताल नहीं होते, ये मेडिकल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और शोध के स्तंभ होते हैं। इनसे डॉक्टरों का पलायन केवल संस्थान का नुकसान नहीं, पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है।


उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल KGMU को ‘ब्रेन ड्रेन’ की बीमारी कैसे लग गई?

🏥 भूमिका

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ — उत्तर भारत का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल। जहां हर दिन हजारों मरीजों का इलाज होता है, वहीं अब यह संस्थान खुद एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है — ‘ब्रेन ड्रेन’, यानी योग्य डॉक्टरों और प्रोफेसरों का पलायन।

यह सवाल उठता है कि देश के टॉप मेडिकल संस्थानों में शुमार KGMU आखिर क्यों अपने ही डॉक्टरों को रोक नहीं पा रहा? क्या कारण हैं कि डॉक्टर नौकरी छोड़कर निजी अस्पतालों या विदेशों का रुख कर रहे हैं?


🔍 ‘ब्रेन ड्रेन’ क्या है?

ब्रेन ड्रेन उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी संस्थान, राज्य या देश से प्रतिभाशाली, प्रशिक्षित और अनुभवी लोग बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन कर जाते हैं। यह किसी भी संस्थान की गुणवत्ता, सेवाओं और कार्यक्षमता को कमजोर करता है।


🧑‍⚕️ डॉक्टर क्यों छोड़ रहे हैं KGMU?

1. वेतन और भत्तों की असमानता

KGMU के डॉक्टरों का वेतन केंद्र सरकार या निजी अस्पतालों के मुकाबले काफी कम है। एक ही स्तर के प्रोफेसर को एम्स जैसे संस्थानों में 2 से 3 गुना अधिक वेतन मिलता है।

2. कार्य का अत्यधिक दबाव

यहां प्रतिदिन ओपीडी में 10,000 से अधिक मरीज आते हैं। एक डॉक्टर को दिन भर में 100-150 मरीज देखने पड़ते हैं। इतने भारी दबाव में गुणवत्तापूर्ण सेवा देना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

3. प्रमोशन और प्रशासनिक जटिलताएं

प्रमोशन की प्रक्रिया धीमी और जटिल है। वर्षों से एक ही पद पर टिके रहने से डॉक्टरों का मनोबल गिरता है।

4. बुनियादी सुविधाओं की कमी

जहां निजी संस्थान अत्याधुनिक उपकरण और साफ-सुथरे वर्किंग एनवायरमेंट का वादा करते हैं, वहीं KGMU जैसे संस्थानों में अब भी संसाधनों की भारी कमी बनी हुई है।

5. रिसर्च और ग्रांट का अभाव

KGMU में शोध कार्य को वह बढ़ावा नहीं मिल पाता जो AIIMS या PGI जैसे संस्थानों में मिलता है। रिसर्च के लिए ग्रांट, फंडिंग और सहयोग की भारी कमी है।


📉 आंकड़ों में ‘ब्रेन ड्रेन’

हाल ही में एक आरटीआई (RTI) से पता चला कि पिछले 5 वर्षों में KGMU से 80 से अधिक वरिष्ठ डॉक्टरों ने संस्थान को छोड़ा। इनमें कई प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष शामिल हैं।

कुछ डॉक्टरों ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज जॉइन किए, तो कुछ ने विदेशों में रिसर्च फेलोशिप और प्रैक्टिस शुरू की। खासकर अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों में बेहतर वेतन और सुविधाओं ने उन्हें आकर्षित किया।


🧑‍⚖️ सरकार और प्रशासन क्या कर रहा है?

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस संकट को गंभीरता से लेने की बात तो कही है, लेकिन अब तक कोई ठोस नीति सामने नहीं आई। कुछ डॉक्टरों को प्रमोशन दिया गया, तो कुछ को वेतनमान की समीक्षा का आश्वासन मिला, लेकिन नीतिगत सुधार अब भी अधूरे हैं।

KGMU प्रशासन ने इंटरनल सर्वे कराया, जिसमें 60% डॉक्टरों ने बताया कि वे यदि मौका मिला तो संस्थान छोड़ना चाहेंगे।


🧠 जब ब्रेन ही नहीं रहेगा तो सेवा कौन देगा?

KGMU पर पूरे उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और नेपाल के मरीज भी निर्भर हैं। जब संस्थान से अनुभवी डॉक्टरों का पलायन होगा, तो:

  • शिक्षण की गुणवत्ता घटेगी
  • इलाज में देरी और गलतियां बढ़ेंगी
  • मरीजों का भरोसा कम होगा
  • MBBS और PG स्टूडेंट्स को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाएगा

🌐 तुलना: केंद्र बनाम राज्य संस्थान

बिंदुAIIMS (केंद्र सरकार)KGMU (राज्य सरकार)
वेतन₹1.8 लाख+₹70,000 – ₹1 लाख
प्रमोशन प्रक्रियापारदर्शी और समयबद्धधीमी और जटिल
रिसर्च ग्रांटअधिकबहुत कम
उपकरण और तकनीकअत्याधुनिकअक्सर पुराने या अनुपलब्ध
इंटरनेशनल एक्सपोजरनियमितबहुत सीमित

💬 डॉक्टरों की प्रतिक्रिया

डॉ. अरुण मिश्रा, पूर्व विभागाध्यक्ष, कार्डियोलॉजी:
“मैंने 20 साल KGMU को दिए, लेकिन अंत में सम्मान और सुविधा की कमी ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं प्राइवेट सेक्टर में चला जाऊं।”

डॉ. नेहा सिंह, ENT प्रोफेसर:
“यहां इलाज से ज्यादा संघर्ष प्रशासन से होता है। आप रिसर्च करना चाहते हैं, लेकिन संसाधन नहीं। नौकरी की संतुष्टि गायब हो चुकी है।”


🧩 समाधान क्या हो सकते हैं?

  1. वेतन और प्रमोशन नीति केंद्र के समकक्ष बनाना
  2. रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार से विशेष फंड
  3. इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड और उपकरणों की त्वरित आपूर्ति
  4. वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए रोस्टर सिस्टम और मेंटल हेल्थ सपोर्ट
  5. विदेशी मेडिकल प्रोफेशनल्स और NRI डॉक्टर्स को जोड़ने की पहल

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Raja Shakti Raj Singh
Raja Shakti Raj Singhhttps://dabangsuchna.com
राजा शक्ति राज सिंह "दबंग सूचना" के संस्थापक और स्वामी हैं। वे निष्पक्ष, निर्भीक और जन-समर्पित पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं। उनका उद्देश्य सच्चाई को आम जनता तक पहुंचाना है। डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में उनका योगदान सराहनीय है और उन्होंने "दबंग सूचना" को विश्वसनीय समाचार स्रोत के रूप में स्थापित किया है।
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