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महिला थाना प्रभारी और पुलिस स्टाफ पर FIR—न्याय की

छत्तीसगढ़ ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 3 August 2025

रायपुर से आई यह शर्मनाक घटना बताती है कि न्याय की आस में थाने पहुंचे एक पीड़िता की कैसे थाने में ही बेरहमी से पिटाई हुई। यह किस कदर विडंबनापूर्ण है कि महिलाओं के अधिकार की रक्षा के लिए बने थाने में ही गुनाहगार बने पुलिसकर्मियों ने मासूम महिला को पीटा—और फिर भी एफआईआर डॉट डॉट में उलझी रही। आइए विवेचना के साथ समझें पूरा केस।


🔎 मामले का संक्षिप्त परिचय

रायपुर की यास्मीन बानो (पीड़िता) ने कथित घरेलू हिंसा की शिकायत महिला थाना में दर्ज करने आई। मामले ने गंभीर मोड़ तब ले लिया, जब शिकायत स्वीकार न होने पर उसे थाने में ही गाली-गलौज और बेल्ट‑डंडे से पिटाई हुई। आरोप है कि थाने की प्रभारी टीआई वेदवति दरियो, एसआई शारदा वर्मा, महिला सिपाही फगेश्वरी कंवर सहित अन्य महिला पुलिसकर्मी और साथ में उसकी शिकायत वापस लेने के लिए उसके पति सैय्यद आसिफ अली ने मिलकर मारपीट की ।

यास्मीन ने अदालत में परिवाद दर्ज कराया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फर्रारी नहीं ली, बल्कि FIR दर्ज करने का आदेश दिया। उसके अनुरूप, पुलिस ने धारा 294, 323, 506 (भाग 2)/34 के तहत तत्कालीन महिला थाना प्रभारी वेदवति दरियो, एसआई, सिपाही और यास्मीन के पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।


थाने में न्याय की बजाय यातना: सबसे बड़ा संकट

  • शिकायत न सुनना: यास्मीन की शिकायत को टीआई दरियो ने अनसुना कर दिया, जबकि यह उनकी जिम्मेदारी थी कि पीड़िता की बात संवेदनशीलता से सुनी जाए।
  • गाली-गलौज और शारीरिक प्रताड़ना: थाने में कहासुनी के बाद पति और स्टाफ ने मिलकर उसे गालियां दीं और डंडे-बेल्ट से बेरहमी से पीटा, जिससे गर्दन और पीठ पर गहरे निशान बने ।
  • FIR न दर्ज करना: जहां नियम यह कहता है कि थाने में मामला दर्ज किया जाए, वहीं टीआई ने चार महीनों तक एफआईआर दर्ज नहीं करवाई। पीड़िता को न्याय के लिए कोर्ट तक जाना पड़ा।
  • न्यायिय आदेश की दरकार: अंतिम रूप से शिकायत न्यायपालिका तक पहुंची और कोर्ट ने FIR दर्ज करने पर आदेश दिया—यह दर्शाता है कि न सिर्फ पुलिस सिस्टम असफल रहा, बल्कि पीड़िता को थाने में पीट-पीट कर न्याय से वंचित किया गया।

🧾 प्रमुख तथ्य: कौन था कौन?

व्यक्ति / पक्षभूमिका / आरोप
यास्मीन बानोपीड़िता; पति से पारिवारिक विवाद अवगत कराने थाने पहुंची
सैय्यद आसिफ अलीयास्मीन का पति; थाने में मारपीट और गाली-गलौज में सक्रिय
वेदवति दरियो (TI)महिला थाना प्रभारी; शिकायत न सुनने, मारपीट में शामिल
एसआई शारदा वर्मा और फगेश्वरी कंवर (महिला सिपाही)थाने में मारपीट में सहयोगी

🗣️ न्याय की चाह क्योंकि थाने में ही न्याय नहीं मिला

इस घटनाक्रम से एक कटु सच सामने आता है‑ वह यह कि जहां न्याय की उम्मीद थी, वहीं पीड़िता को प्रताड़ना झेलनी पड़ी। यास्मीन अपनी मां के साथ थाने आयी थी ताकि कोर्ट की बजाय थाने में अधिकारिक रूप से मदद मिल जाए। लेकिन, वहाँ की शक्तियां ही उसी जगह उसे चोट पहुँचा चुकी थीं—एक दर्दनाक अनुभव।

इतना ही नहीं, जब मामले की शिकायत SP से की गई तब भी कोई तत्कालीन कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार मार्च 17, 2024 को थाने बुलाया गया, जहां बर्बरता की कहानी और भी भयानक रूप ले चुकी थी


⚖️ कोर्ट की मुहर बनी राहत की आस

FIR न होने के बावजूद पीड़िता ने अदालत की शरण ली। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद कोतवाली पुलिस ने संबंधित सभी आरोपियों—पति, टीआई, SI, महिला सिपाही—के खिलाफ धारा 294, 323, 506(2)/34 के तहत FIR जारी की


यह ब्लॉग क्यों लिखा गया?

  • यह कहानी सिर्फ निजी विवाद नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था में विश्वास खोने की चेतावनी है।
  • जब पीड़िता थाने में शिकायत लेकर जा रही थी, तब उसे न्याय की उम्मीद थी—लेकिन(status quo) को पलटने के लिए थाने में जांच-पड़ताल की बजाय प्रताड़ना की नीति अपनाई गयी।
  • मूल उद्देश्य: थाने अब आरोपियों को डराने-धमकाने या चुप कराने की जगह, न्याय दिलाने की जिम्मेदारी निभाएँ। इस घटना ने सिस्टम का ढाँचा कमजोर होने की एक चीर खोजी।

📉 निष्कर्ष

इस घटना ने न सिर्फ एक महिला को उसकी शक्ति और आत्मसम्मान से वंचित किया, बल्कि दर्शाया कि सिस्टम के भीतर कितना गहरा दरार है—जहाँ शिकायत करने वाले ही प्रताड़ित हों। FIR दर्ज होना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन सवाल है: इतनी देर क्यों हुई?

अगर थाना प्रणाली में सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएँ निरंतर सामाजिक व्यवस्था की नींव को हिला देंगी।

💬 अंत में: न्याय की दुहाई तभी जायज़ जब थाने न्याय दिलाने की पहल करें

यास्मीन की कहानी हमें यही याद दिलाती है कि थाने की दीवारें ही कुछ नहीं रोक सकती—अगर इंसाफ देने वाली सरकार और पुलिस व्यवस्था न्याय के प्रति सचेत न हो। और जब तक थाने मानवाधिकारों का पालन नहीं करते, FIR दर्ज होना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं—बल्कि लड़ाई की शुरुआत है।

इस ब्लॉग के माध्यम से एक आह्वान है: “न्याय की उम्मीद करने वाले को न्याय देने वाले से ही न्याय की उम्मीद करनी चाहिए, न कि पीड़ितों को ही बेल्ट-डंडे से डराना चाहिए।”

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