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दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला को आपराधिक मामला वापस लेने की दी इजाजत

राज्य ✍ Raja Shakti Raj Singh 🕐 31 August 2024

नई दिल्ली
 क्या आपने सुना है कि कभी कोई अदालत से इस आधार पर केस वापस लाने की गुहार लगाए कि वह काम-धाम छोड़कर बार-बार कोर्ट का चक्कर नहीं लगा सकता या लगा सकती? दिल्ली हाई कोर्ट में ऐसा ही मामला सामने आया है। 'बार एंड बेंच' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक आपराधिक मामले को वापस लेने की इजाजत दे दी। शिकायतकर्ता महिला ने कहा कि वह बार-बार कोर्ट की सुनवाई में शामिल होने के लिए काम छोड़कर थक गई है। लिहाजा वह नहीं चाहती कि केस आगे बढ़े। महिला ने कहा, 'काम छोड़कर बार-बार कोर्ट नहीं आ सकती।' इस पर हाई कोर्ट ने उसे केस वापस लेने की इजाजत तो दी लेकिन इस शर्त पर कि याचिकाकर्ता (आरोपी) कोर्ट का खर्च वहन करेगा। जब याचिकाकर्ता के वकील ने खर्च की वसूली न करने की गुजारिश की तो हाई कोर्ट ने साफ कहा कि अगर खर्च जमा नहीं हुआ तो केस चलता रहेगा।

मामला ट्रायल कोर्ट में चल रहा था। शिकायतकर्ता महिला ने दूसरे पक्ष के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था। ट्रायल कोर्ट में केस चल ही रहा था कि शिकायतकर्ता और आरोपी (याचिकाकर्ता) दोनों पक्ष मामले को सुलझाने की अनुमति के लिए हाई कोर्ट पहुंचे। शिकायतकर्ता ने केस वापस लेने की इजाजत मांगते हुए कहा, 'बार-बार कोर्ट नहीं आ सकती, काम छोड़ के।'

अब यही असली वजह है कि 10 में से 7 मामलों में केस वापस लिए जा रहे हैं। इसी को मुकदमेबाजी की थकान कहते हैं कि आप केस को आगे बढ़ाने के लिए बार-बार कोर्ट नहीं आ सकते।

जस्टिस अनूप भंभानी ने कहा कि यह मुकदमेबाजी की थकान का नतीजा है। उन्होंने कहा, 'अब यही असली वजह है कि 10 में से 7 मामलों में केस वापस लिए जा रहे हैं। इसी को मुकदमेबाजी की थकान कहते हैं कि आप केस को आगे बढ़ाने के लिए बार-बार कोर्ट नहीं आ सकते।' उन्होंने आगे कहा कि ऐसा नहीं लगता कि केस वापस लेने का यही एकमात्र कारण है। जज ने कहा, 'वह (शिकायतकर्ता) जिरह के चरण में FIR भी इसलिए वापस ले रही है क्योंकि वह जानती है कि आप (याचिकाकर्ता) उसे और शर्मिंदा करेंगे।'

आखिरकार हाई कोर्ट ने केस वापस लेने की अनुमति दे दी लेकिन शर्त के साथ। शर्त ये कि याचिकाकर्ता यानी आरोपी कोर्ट का खर्च वहन करेगा। कोर्ट ने कहा, 'यह स्पष्ट है कि उसे (शिकायतकर्ता) मामले को वापस लेने के लिए दो कारणों ने मजबूर किया है। पहला, मामले को आगे बढ़ाने में समय बर्बाद होता है। दूसरा, जिरह के दौरान शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। हम याचिकाकर्ता पर खर्च लगाते हैं।'

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट से गुजारिश की कि कोई लागत न वसूली जाए क्योंकि यह कानूनी सहायता का मामला है। लेकिन बेंच राजी नहीं हुई। जस्टिस भंभानी ने दो टूक कहा, 'कॉस्ट तो देना पड़ेगा। नहीं तो केस चलता रहेगा।' आखिरकार मामले के निपटारे के लिए याचिकाकर्ता पर 10000 रुपये का खर्च लगाया गया।

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