रायपुर में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने कहा, बालिकाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण समाज का नैतिक व संवैधानिक दायित्व है, परिवार-विद्यालय को भी निभानी होगी जिम्मेदारी।
रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा ने कहा कि बालिकाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण केवल संवैधानिक दायित्व ही नहीं बल्कि समाज का नैतिक कर्तव्य भी है। उन्होंने यह विचार बालिका सुरक्षा और सशक्तिकरण पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में व्यक्त किए।
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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है और महिलाओं व बालिकाओं की गरिमा को सुरक्षित रखने का प्रावधान करता है। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर बालिकाओं के अधिकारों की रक्षा करनी होगी।
कानून और संवैधानिक सुरक्षा
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 बालिकाओं को समानता, भेदभाव से मुक्ति और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं। इसके अलावा ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट (POCSO)’ और ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ जैसे कानून बालिकाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। मुख्य न्यायाधीश ने जोर दिया कि इन कानूनों का प्रभाव तभी होगा जब इनका पालन पूरी गंभीरता से किया जाए।
समाज की भूमिका
मुख्य न्यायाधीश सिन्हा ने कहा कि केवल सरकार और न्यायालय ही नहीं, बल्कि समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि बालिकाओं को सुरक्षित माहौल मिले। परिवार और विद्यालय बालिकाओं की सोच और आत्मविश्वास को विकसित करने की पहली सीढ़ी हैं। उन्होंने माता-पिता और शिक्षकों से आह्वान किया कि वे बेटियों को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने पर जोर दें।
सशक्तिकरण की दिशा में पहल
उन्होंने कहा कि सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘लाड़ली लक्ष्मी’ और ‘कन्या सुमंगल योजना’ जैसी योजनाओं ने बालिकाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का काम किया है। लेकिन इन योजनाओं का लाभ तभी होगा जब हर स्तर पर पारदर्शिता और जनजागरूकता बढ़े।
सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ अपराध केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है बल्कि यह सामाजिक सोच का भी परिणाम है। जब तक समाज मानसिकता नहीं बदलेगा, तब तक सच्चे अर्थों में सुरक्षा संभव नहीं है। उन्होंने अपील की कि बालिकाओं के प्रति सम्मान और समानता की भावना हर परिवार और संस्था में प्राथमिकता बननी चाहिए।
कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य लोग
इस अवसर पर हाईकोर्ट के न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद थे। कार्यक्रम के अंत में छात्राओं ने अपने अनुभव साझा किए और बेटियों की शिक्षा एवं करियर को लेकर सुझाव भी दिए।
निष्कर्ष स्वरूप संदेश
मुख्य न्यायाधीश सिन्हा का संदेश साफ था—बालिकाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण केवल कागजी नारे नहीं होने चाहिए, बल्कि यह समाज और संविधान दोनों का साझा संकल्प होना चाहिए।
