सरोना में आयोजित बस्तर पंडुम में नेताम ने इसे आदिवासी संस्कृति का गौरव बताते हुए कहा कि यह उत्सव परंपरा, प्रकृति संरक्षण और जनजातीय पहचान को सशक्त करता है।
सरोना। छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का प्रतीक “बस्तर पंडुम” एक बार फिर आदिवासी समाज की पहचान और गौरव बनकर उभरा है। सरोना में आयोजित कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ जनप्रतिनिधि नेताम ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी जीवनशैली, परंपराओं और प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते का प्रतीक है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण, कलाकार, लोकनर्तक और आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-मांदर की थाप और लोकनृत्यों की प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। नेताम ने अपने संबोधन में कहा कि बस्तर पंडुम जैसी पहलें आदिवासी संस्कृति की विविधता, लोककला और परंपरागत ज्ञान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज का जीवन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित है। जंगल, पहाड़, नदियां और वन संपदा केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि प्रकृति का संरक्षण और सम्मान ही सतत विकास का आधार है।
कार्यक्रम में विभिन्न जनजातीय समूहों द्वारा नृत्य, गीत, शिल्पकला और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसे देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। युवाओं और बच्चों ने भी पारंपरिक खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
स्थानीय प्रशासन और आयोजन समिति ने बताया कि बस्तर पंडुम का उद्देश्य न केवल संस्कृति को संरक्षित करना है, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देना, स्थानीय कलाकारों को मंच देना और आदिवासी समाज की पहचान को मजबूत करना भी है। कार्यक्रम के समापन पर नेताम ने आयोजकों और कलाकारों को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक गौरव की भावना को और मजबूत करते हैं।


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