वट सावित्री व्रत पर सुहागिनें पति की लंबी उम्र के लिए बरगद की पूजा करती हैं, निर्जला उपवास रखती हैं और पारंपरिक विधि से व्रत निभाती हैं।
रायपुर। वट सावित्री व्रत, भारतीय संस्कृति में महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाने वाला एक विशेष पर्व है। यह पर्व विशेषकर सुहागिन स्त्रियों द्वारा बड़े श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। व्रत के दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं, कई महिलाएं फलाहार के रूप में उपवास रखती हैं, लेकिन पूजा और विधि-विधान में कोई कमी नहीं आती।
यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह से ही तैयारियों में जुट जाती हैं। व्रत के लिए विशेष पूजन सामग्री जुटाई जाती है, जिनमें भीगे हुए देशी चने, देसी लाल शकरकंद, कच्चे आम, पीले धागे, पीले जनेऊ, पायल, बेसन, हल्दी, श्रीफल और अन्य मिठाइयों का विशेष महत्व होता है।
वट वृक्ष की पूजा और 108 परिक्रमा की परंपरा
व्रत की पूजा विधि में सबसे महत्वपूर्ण होता है बरगद के पेड़ (वट वृक्ष) की पूजा। महिलाएं पीले वस्त्र धारण कर, पूजा की थाली सजाकर वट वृक्ष के पास जाती हैं। वहां वे विधिवत पूजा कर पीले धागे से वट वृक्ष की 108 परिक्रमा करती हैं। परिक्रमा करते समय वे अपने पति की लंबी उम्र और सौभाग्य की कामना करती हैं।
पूजन के पश्चात शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। महिलाएं इस अवसर पर देवी सावित्री के त्याग, प्रेम और तप की कहानी का श्रवण भी करती हैं। इस पूजा में सुहाग चिन्हों का विशेष महत्व होता है जैसे सिंदूर, चूड़ी, बिछुआ और पायल आदि।

पति के चरण पूजन की अनोखी परंपरा
पूजा के बाद पत्नी द्वारा पति का पूजन करने की विशेष परंपरा है। इस क्रिया में पत्नी अपने पति के चरण धोती है और उसे चरणामृत स्वरूप ग्रहण करती है। तत्पश्चात उन्हें तिलक लगाकर, पीला जनेऊ पहनाती है और कर्रे की पंखी से हवा देती है। अंत में श्रीफल अर्पण कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती है। इसके बाद पत्नी उपहार और सौभाग्य के चिन्ह पति से प्राप्त करती है।
फलाहार और व्रत का पारण
पूजा और सभी विधियों के संपन्न होने के पश्चात महिलाएं अपना उपवास तोड़ती हैं। व्रत का पारण वे आम का मीठा पना, पूरी, मिठाइयां और फलाहार के साथ करती हैं। यह दिन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक बन गया है, जहां महिलाएं अपनी आस्था और प्रेम को परंपरा के साथ जीती हैं।
बरसात की मान्यता और “बरसाईत” नाम
वट सावित्री व्रत से जुड़ी एक रोचक मान्यता भी वर्षों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि वट सावित्री के दिन बारिश अवश्य होती है। इसलिए कई क्षेत्रों में इसे “बरसाईत” पर्व के नाम से भी जाना जाता है। यह मान्यता लोकविश्वास में गहराई से रची-बसी है और हर वर्ष इसकी प्रतीक्षा की जाती है।

पुराणों में वर्णित व्रत की महिमा
इस व्रत की प्रेरणा सावित्री और सत्यवान की कथा से मानी जाती है, जिसमें सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से तप और बुद्धिमत्ता से वापस प्राप्त किए थे। यह कथा इस व्रत के मूल में है और आज भी महिलाएं श्रद्धापूर्वक इसका स्मरण करती हैं।
समाज में जागरूकता और सांस्कृतिक महत्व
आज के आधुनिक युग में भी यह व्रत भारतीय महिलाओं के लिए सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। युवा पीढ़ी भी इस परंपरा को समझते हुए इससे जुड़ रही है। सोशल मीडिया, सामूहिक पूजन कार्यक्रमों और महिला समूहों के माध्यम से इसके प्रचार-प्रसार से यह परंपरा नई पीढ़ी में भी जीवित है।
