लोकसभा अध्यक्ष जल्द करेंगे जांच समिति का गठन; जस्टिस गंगोपाध्याय पर न्यायिक आचरण उल्लंघन की शिकायत पर आगे बढ़ी महाभियोग प्रक्रिया।
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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और भाजपा नेता जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया एक बार फिर रफ्तार पकड़ रही है। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जल्द ही एक जांच समिति का गठन कर सकते हैं, जो जस्टिस कौशिक चंदा द्वारा गंगोपाध्याय के खिलाफ की गई शिकायत की जांच करेगी।
जस्टिस कौशिक चंदा, जो वर्तमान में कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश हैं, ने यह शिकायत तब की थी जब जस्टिस गंगोपाध्याय न्यायपालिका में कार्यरत थे। शिकायत में न्यायिक आचरण के उल्लंघन, राजनीतिक पूर्वाग्रह और न्यायिक मर्यादा की अनदेखी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे।
क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण?
यह मामला संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। जस्टिस गंगोपाध्याय उस समय सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने शिक्षक भर्ती घोटाले में कई आक्रामक फैसले सुनाए थे। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थामते हुए राजनीति में कदम रखा और 2024 में चुनाव भी लड़ा।
वहीं जस्टिस चंदा की शिकायत में कहा गया है कि न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने अपने पद पर रहते हुए सार्वजनिक और राजनीतिक बयानों के ज़रिए न्यायिक निष्पक्षता की मर्यादा को क्षति पहुंचाई। संविधान के अनुच्छेद 124 (4) और न्यायिक आचरण संहिता के संदर्भ में यह मामला गंभीर माना जा रहा है।
अगला कदम: अनुच्छेद 124(4) के तहत प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत यदि किसी न्यायाधीश के खिलाफ गंभीर आरोप होते हैं, तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। इससे पहले एक जांच समिति का गठन किया जाता है, जो आरोपों की सच्चाई की पुष्टि करती है।
लोकसभा अध्यक्ष को अब जांच समिति के लिए तीन सदस्यों को नामित करना है, जिसमें एक सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, एक हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
राजनीतिक और संवैधानिक तनाव
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय का भाजपा में शामिल होना और सक्रिय राजनीति में उतरना कई कानूनी और नैतिक बहसों को जन्म दे चुका है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की राजनीतिक सक्रियता सवालों के घेरे में आई हो, लेकिन गंगोपाध्याय का मामला इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि उन पर न्यायपालिका में रहते हुए राजनीतिक झुकाव रखने का आरोप लगा है।
संसद के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यदि शिकायत प्रमाणिक पाई जाती है तो यह भारतीय न्यायिक इतिहास में एक दुर्लभ लेकिन जरूरी कदम होगा।”
पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले
भारत के इतिहास में न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग के प्रयास दुर्लभ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी और हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीशों पर महाभियोग की कार्यवाहियां शुरू की गई थीं, लेकिन अधिकांश मामले राजनीतिक सहमति की कमी के कारण अधूरे रह गए।
निष्कर्ष
इस मामले में कार्रवाई से यह संदेश जाएगा कि न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता सर्वोपरि है। यदि लोकसभा अध्यक्ष जांच समिति की घोषणा करते हैं, तो यह भारत के लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जहाँ न्यायिक जवाबदेही की दिशा में ठोस कदम उठाया जा
