छत्तीसगढ़ के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर ठगी का शिकार हुए। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगों ने 88 लाख रुपये ऐंठे।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में साइबर ठगों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। ताजा मामला राज्य के एक प्रतिष्ठित सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर से जुड़ा है, जहां एक वरिष्ठ प्रोफेसर को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डराकर ठगों ने उनसे 88 लाख रुपये ठग लिए। यह मामला न केवल प्रोफेसर समुदाय को झकझोर गया है, बल्कि साइबर सिक्योरिटी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
घटना की शुरुआत
पीड़ित प्रोफेसर को एक कॉल आया जिसमें खुद को केंद्रीय एजेंसी का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति ने कहा कि उनकी पहचान मनी लॉन्ड्रिंग व ड्रग तस्करी जैसे अपराधों में इस्तेमाल की जा रही है। कॉलर ने यह दावा किया कि उनके नाम पर एक पार्सल मुंबई एयरपोर्ट पर जब्त किया गया है जिसमें ड्रग्स और फर्जी दस्तावेज हैं।
इसके बाद प्रोफेसर को वीडियो कॉल पर जोड़ा गया। कॉल में वर्दीधारी अधिकारियों जैसे लोगों को दिखाकर उन्हें भरोसे में लिया गया और बताया गया कि उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है। इसका मतलब यह था कि वह न तो बाहर जा सकते हैं, न ही किसी से बात कर सकते हैं जब तक जांच पूरी नहीं होती।
भय और भ्रम में आई ठगी
डर और भ्रम के इस माहौल में प्रोफेसर से कहा गया कि अगर वे निर्दोष हैं तो अपनी बैंक डिटेल और खाते में मौजूद राशि की पूरी जानकारी साझा करें। अगले ही चरण में उनसे कहा गया कि जांच प्रक्रिया के तहत उनकी रकम को “सुरक्षित सरकारी खाते” में ट्रांसफर करना होगा।
भयभीत प्रोफेसर ने ठगों के कहे अनुसार एक-एक कर करीब 88 लाख रुपये विभिन्न खातों में ट्रांसफर कर दिए। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि जांच पूरी होने के बाद यह राशि उन्हें लौटा दी जाएगी।
प्रोफेसर को हुआ शक
लगातार कई दिन तक फोन पर निगरानी और मानसिक दबाव के बाद, प्रोफेसर को स्थिति पर संदेह हुआ और उन्होंने परिवार से संपर्क कर घटना साझा की। इसके बाद परिजनों ने तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई।
पुलिस जांच और खुलासा
शिकायत मिलते ही साइबर सेल ने जांच शुरू की और पता चला कि यह ठगी का एक संगठित नेटवर्क है। कॉल दिल्ली, मुंबई और कुछ अंतरराष्ट्रीय स्थानों से ट्रेस किए गए हैं। पुलिस को संदेह है कि इस नेटवर्क में विदेशी साइबर अपराधी भी शामिल हैं।
साइबर पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह वही गिरोह है जो पहले भी कई बड़े व्यवसायियों, रिटायर्ड अधिकारियों और शिक्षाविदों को अपना शिकार बना चुका है। इस केस में अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो पाई है, लेकिन कुछ संदिग्ध खातों को होल्ड में लिया गया है।
डिजिटल अरेस्ट: एक नया फर्जी जाल
‘डिजिटल अरेस्ट’ शब्द नया है लेकिन साइबर ठगों के लिए बेहद कारगर हथियार बनता जा रहा है। पीड़ित को मानसिक दबाव में डालकर उससे मनचाही जानकारी और पैसा हासिल करने की यह तरकीब हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है।
साइबर एक्सपर्ट्स की राय
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी द्वारा फोन पर गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं की जाती। यदि कोई इस तरह की जानकारी देता है तो उसे तुरंत नजदीकी थाने में रिपोर्ट करना चाहिए।
प्रशासन की चेतावनी
छत्तीसगढ़ पुलिस ने इस घटना के बाद आम नागरिकों को अलर्ट किया है कि वे किसी भी अनजान कॉल, विशेषकर खुद को अधिकारी बताने वाले कॉल से सावधान रहें। कोई भी वित्तीय जानकारी या बैंक डिटेल्स किसी के साथ साझा न करें।
निष्कर्ष
यह घटना दर्शाती है कि आज के डिजिटल युग में सबसे शिक्षित वर्ग भी साइबर अपराधियों का शिकार हो सकता है। डर, भ्रम और तकनीकी जाल में फंसाकर आम लोगों को ठगने की यह प्रक्रिया अब खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसे में सतर्कता और जागरूकता ही एकमात्र बचाव है।
