सिम्स बिलासपुर में डॉक्टरों का खाना पॉलीथिन पर खुले में परोसा गया, हाईकोर्ट ने डीन-कलेक्टर से शपथपत्र सहित जवाब मांगा, अव्यवस्था पर जताई नाराजगी।
बिलासपुर । राज्य के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक, सिम्स (छत्तीसगढ़ इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) से जुड़ी एक शर्मनाक घटना सामने आई है। अस्पताल में डॉक्टरों को खुले में पॉलीथिन पर खाना परोसे जाने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे अव्यवस्था की पराकाष्ठा बताते हुए सिम्स के डीन और बिलासपुर कलेक्टर से शपथपत्र सहित जवाब तलब किया है।
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क्या है मामला?
यह मामला तब उजागर हुआ जब सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पताल प्रबंधन की याचिका पर सुनवाई के दौरान, एक तस्वीर कोर्ट के संज्ञान में आई। इस तस्वीर में डॉक्टरों को खुले में, ज़मीन पर बिछी पॉलीथिन पर भोजन करते हुए देखा गया। इस दृश्य ने न्यायालय को स्तब्ध कर दिया।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में सिंगल यूज़ पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। बावजूद इसके, सरकारी अस्पताल में पॉलीथिन का प्रयोग और खुले में भोजन व्यवस्था ने न्यायपालिका को नाराज कर दिया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“जहां डॉक्टरों को सम्मान मिलना चाहिए, वहां उन्हें खुले में पॉलीथिन पर बैठाकर खाना परोसा जा रहा है। यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि अपमान है।”
कोर्ट ने सिम्स के डीन और बिलासपुर कलेक्टर को 7 दिनों के भीतर शपथपत्र के साथ स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।
सरकारी व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल
यह घटना छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। सवाल ये है कि जहां राज्य सरकार लाखों रुपये अस्पतालों के बजट में खर्च करती है, वहां बुनियादी व्यवस्था — जैसे स्वच्छ भोजन और बैठने की व्यवस्था — क्यों नहीं है?
चिकित्सकों में नाराजगी
सिम्स के डॉक्टरों और स्टाफ में भी घोर असंतोष है। एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
“हम दिनभर मरीजों की सेवा करते हैं, और हमें खाने के लिए न छत मिलती है, न कुर्सी, न ही साफ-सुथरी व्यवस्था।”
पॉलीथिन बैन की उड़ाई जा रही धज्जियां
राज्य सरकार द्वारा पॉलीथिन पर प्रतिबंध के बावजूद सिम्स जैसे प्रमुख संस्थान में इसका प्रयोग होना कानून का मखौल उड़ाता है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्ती दिखाते हुए संबंधित अधिकारियों से यह भी पूछा है कि पॉलीथिन का इस्तेमाल क्यों और कैसे हुआ?
भोजन आपूर्ति ठेकेदार की भूमिका संदिग्ध
इस मामले में यह भी संदेह है कि भोजन आपूर्ति करने वाले ठेकेदार की लापरवाही का भी इसमें बड़ा हाथ है। ठेके के तहत डॉक्टरों और स्टाफ को उचित खाना व व्यवस्था देना उसकी जिम्मेदारी थी।
सूत्रों के अनुसार, पहले भी भोजन की गुणवत्ता को लेकर कई बार शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
न्यायालय के निर्देश
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि:
- डॉक्टरों के लिए सम्मानजनक भोजन व्यवस्था होनी चाहिए।
- पॉलीथिन प्रतिबंध का पालन सुनिश्चित किया जाए।
- भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसके लिए नियमित निरीक्षण और रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित की जाए।
- दोषियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की जाए।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
बिलासपुर कलेक्टर और सिम्स डीन ने इस पर फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन सूत्रों की मानें तो अंदरूनी स्तर पर जांच शुरू हो गई है और अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं का पुनः मूल्यांकन किया जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की ज़रूरत
यह घटना छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य सेवाओं को एक आईना दिखाने जैसा है। जहां डॉक्टरों की गरिमा और उनके कार्य के प्रति सम्मान होना चाहिए, वहां बुनियादी आवश्यकताओं की अनदेखी गंभीर चिंता का विषय है।
निष्कर्ष
डॉक्टर केवल इलाज नहीं करते, वे समाज की रीढ़ होते हैं। यदि उन्हें ही सम्मान, स्वच्छता और सुविधा से वंचित रखा जाए तो यह हमारे स्वास्थ्य तंत्र की सबसे बड़ी विफलता होगी। कोर्ट की इस फटकार को प्रशासन को चेतावनी के रूप में लेना चाहिए, न कि औपचारिकता के रूप में।





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